Sunday, July 20, 2025

हरेला पर्व: उत्तराखंड की हरियाली और संस्कृति का उत्सव

 





हरेला उत्तराखंड का एक बहुत ही महत्वपूर्ण और पारंपरिक त्योहार है, जिसे विशेष रूप से कुमाऊँ क्षेत्र में बड़े श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह त्योहार हर साल सावन माह की शुरुआत में मनाया जाता है, जो कि आमतौर पर जुलाई महीने में आता है। ‘हरेला’ शब्द का अर्थ है हरियाली या हरा रंग, जो इस पर्व की आत्मा को दर्शाता है।

हरेला मुख्य रूप से प्रकृति, खेती और पर्यावरण से जुड़ा पर्व है। इस दिन को नए मौसम, हरियाली के आगमन और फसलों की शुभ शुरुआत के रूप में मनाया जाता है। पर्व से करीब 9-10 दिन पहले, घरों में मिट्टी के छोटे बर्तनों या पत्तों में गेहूं, जौ या मक्का के बीज बोए जाते हैं। धीरे-धीरे इन बीजों से हरे अंकुर निकलते हैं, जिन्हें हरेला कहा जाता है। यही हरेले त्योहार का मुख्य प्रतीक होता है।

जब ये अंकुर 8-10 दिन में पूरी तरह से उग जाते हैं, तब हरेला पर्व के दिन इन्हें पूजा में इस्तेमाल किया जाता है। पूजा के बाद घर के बुजुर्ग इन हरेले को बच्चों और परिवार के अन्य सदस्यों के सिर पर रखकर आशीर्वाद देते हैं। वे आशीर्वाद में कहते हैं – “जीते रहो, फलो-फूलो, तरक्की करो”। यह परंपरा प्यार, सुरक्षा और समृद्धि का प्रतीक मानी जाती है।

हरेला के दिन लोग अपने घरों के आसपास पेड़-पौधे भी लगाते हैं। यह पर्व पर्यावरण संरक्षण का सशक्त संदेश देता है। साथ ही, हरेला सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक भी है। गांवों में इस दिन लोग पारंपरिक वेशभूषा पहनते हैं, लोकगीत गाते हैं, नाचते हैं और एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं। बच्चे भी इस दिन को बहुत उत्साह के साथ मनाते हैं।

No comments:

Post a Comment

हरेला पर्व: उत्तराखंड की हरियाली और संस्कृति का उत्सव

  हरेला उत्तराखंड का एक बहुत ही महत्वपूर्ण और पारंपरिक त्योहार है, जिसे विशेष रूप से कुमाऊँ क्षेत्र में बड़े श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया ...